अरावली पर्वतमाला:हॉल ही में अरावली पर्वत श्रृंखला की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा स्वीकार की है |अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट के तहत 2030 तक क्षतिग्रस्त भूमि को पुनर्स्थापित करने की योजना चर्चा का केंद्र बनी हुई है |अवैध खनन तथा शहरीकरण से अरावली का पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है, जिस पर विशेषज्ञ चिंता जता रहे है |इस लेख में अरावली पर्वत के बारे में और अरावली पर्वतमाला के सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के प्रमुख बिन्दुओं पर चर्चा करेंगे |

अरावली पर्वतमाला के बारें में-
1-अरावली रेंज का विस्तार गुजरात के हिम्मतनगर से दिल्ली तक लगभग 720 किलोमीटर की दूरी तक है, जो हरियाणा तथा राजस्थान तक विस्तारित है |
2-अरावली रेंज लाखों साल पुराना है, जिसका निर्माण भारतीय उपमहाद्वीप प्लेट के यूरेशियन प्लेट की मुख्य भूमि से टकराने के कारण हुआ |
3-कार्बन डेटिंग से पता चला है कि अरावली रेंज में तांबे तथा अन्य धातुओं का खनन लगभग 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में किया गया था |
4-अरावली रेंज की सबसे ऊँची चोटी माउन्ट आबू पर स्थित गुरु शिखर (1722 मीटर) है |
5-पहाड़ों को राजस्थान में दो मुख्य श्रेणियों सांभर सिरोही रेंज तथा सांभर खेतड़ी रेंज में विभाजित किया गया है, जहाँ उनका विस्तार लगभग 560 किलोमीटर तक है |
6-दिल्ली से लेकर हरिद्वार तक फैले अरावली का अदृश्य भाग गंगा तथा सिन्धु नदियों के जल के बीच एक विभाजन बनाता है |
7-उत्तर पश्चिमी भारत के पारिस्थितिक तंत्र के रीढ़ के रूप में भी अरावली की पहचान है |
8-अरावली पर्वतमाला चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, तांबा, जस्ता, टंगस्टन जैसे महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों से भी समृद्ध है |
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रमुख बिंदु-
1-सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवम्बर 2025 को अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को स्वीकार किया, जिसमें स्थानीय भू-आकृति से 100 मीटर या अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियाँ शामिल है |
2-अरावली पर्वतमाला को निम्नतम समोच्च रेखा द्वारा घिरे क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया, जिसमें पहाड़ी, ढलान तथा संबंधित भू-आकृतियाँ सम्मिलित है |
3-500 मीटर की दूरी के भीतर दो या अधिक अरावली पहाड़ियां पर्वतमाला का निर्माण करती है |
4-इस कदम से अरावली के 90% से अधिक हिस्से, जैसे झाड़ीदार पहाड़ियां तथा घास के मैदान, खनन के लिए खुल सकते है, जो पारिस्थितिकी के लिए विनाशकारी होगा |
5-आगे और अधिक विनाश होने से थार रेगिस्तान से लेकर दिल्ली-NCR तथा उससे आगे तक मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती है |
6-हरियाणा, राजस्थान तथा गुजरात के विशाल भूभाग खनन तथा पत्थर-कुचलने के कारण पहले से ही गंभीर पारिस्थितिकी गिरावट के लक्षण दिख रहे है |
7-इससे 30 वर्षों से प्राप्त क़ानूनी संरक्षण, जिसमें 1992 की MoEFCC अधिसूचना तथा 2021 की NCR योजना शामिल है, समाप्त हो जायेगा |
अरावली परिभाषा की पृष्ठभूमि-
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों तथा पर्वतमाला की परिभाषा में एकरूपता लाने की कोशिश की |इससे पहले अरावली पर्वतमाला तथा उनके पहाड़ियों के बीच में अलग-अलग राज्यों में विभिन्न अलग-अलग संस्थाओं के द्वारा उसकी जो परिभाषा थी उसमें एक भ्रम की स्थिति बनी हुई थी |उस भ्रम को समाप्त करते हुए एक एकरूप परिभाषा हो जो हर जगह एक ही परिभाषा मान्य हो |परिभाषा का स्पष्ट होना जरुरी था और इस जरुरत को महसूस करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस परिभाषा में एकरूपता लाने के लिए अपना निर्णय दिया |
Central Empowered Committee ने इस परिभाषा की सिफारिश की थी |CEC को 2002 में गठित किया गया था |यह अदालत की एक सहायक समिति होती है |CEC सुप्रीम कोर्ट को विशेष तौर पर जो वन, पर्यावरण तथा अवैध गतिविधियों के संबंध में यह तकनीकी रूप से सहायता देने का काम करती है |
इस समिति ने यह महसूस किया कि जो खनन गतिविधियाँ है उसके समग्र पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन जरुरी है |आकलन करने के बाद इस समिति ने पाया कि विशेष तौर पर कुछ ऐसे क्षेत्र है जिसका संरक्षण बहुत आवश्यक है |विशेष तौर पर अरावली रेंज में जो संरक्षित वन क्षेत्र है वह प्रभावित न हो |वन्य जीव आवास जो गलियारे होते है उनकी सुरक्षा जरुरी है |जो जल स्रोत होते है उनके आस -पास खनन की गतिविधि न हो उसकी सुरक्षा जरुरी है |इसी प्रकार जल के पुनर्भरण का जो क्षेत्र होता है वह भी संवेदनशील होता है, इसलिए उनका संरक्षण भी जरुरी है |इसी तरह बाघ गलियारा और एनसीआर के आसपास का क्षेत्र है यहाँ पर खनन गतिविधियों को मॉनिटर करना जरुरी है |CEC ने इन परिस्थितियों को महसूस करने के बाद यह देखा कि इन जगहों पर जो संवेदनशील जगह है वहां स्टोन क्रश करने वाली जो यूनिट लगी है यानी कि पत्थरों को तोड़ने वाली या खनन करने वाली जो यूनिट लगी है उसको लेकर कड़े नियम बनाये जाने की आवश्यकता है |CEC समिति ने यह सिफारिश की कि जब तक इस दिशा में अध्ययन पूरी तरह से पूरा नहीं होता है तब तक इस क्षेत्र में नयी खनन के लिए जो लीज दी जाती है उस पर रोक लगा देना चाहिए तथा उसका जो नवीकरण होता है उस पर भी रोक लगा दिया जाना चाहिए |सुप्रीम कोर्ट ने इन सिफारिशों को मान लिया तथा इन्ही सिफारिशों के आधार पर वर्ष 2025 में अरावली ग्रीन वाल परियोजना शुरू की |
अरावली ग्रीन वाल परियोजना शुरू होने में दिक्कत यह थी कि जब तक अरावली पहाड़ी और उसके पर्वत की परिभाषा ही स्पष्ट नहीं है तब तक कोई भी परियोजना का क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पायेगा |इसके लिए यहाँ पर जो सबसे बड़ी दुविधा थी वह एक समान एकरूप परिभाषा की थी |उस दुविधा को सुप्रीम कोर्ट ने दूर कर दिया |
संरक्षण बनाम विकास-
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध लगाने से जो अवैध खनन माफिया होते है वह सक्रिय हो जाते है तथा साथसाथ अनियंत्रित और गैर-क़ानूनी खनन अधिक बढ़ जाता है |इसलिए हम पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकते है |विकास को भी हम स्थान देंगे तथा सर्वोच्च न्यायालय ने कह कि पूर्ण प्रतिबंध की बजाय हम यहाँ पर संतुलित दृष्टिकोण अपना सकते है क्योंकि जो संवेदनशील क्षेत्र है जो 100 मीटर से ऊपर वाली ऊंचाई पर स्थित है उनको तो हम सुरक्षित कर देंगे वहां पूर्ण प्रतिबंध होगा ही होगा |शेष क्षेत्र में हम वैध खनन को सख्त नियम तथा निगरानी के तहत जारी रखने की अनुमति देंगे |जो वैध खनन होगा उसमें हम देख्नेगे की सतत खनन ही हो रहा है जिससे कि पर्यावरण को नुकसान नहीं हो उस पर मॉनिटर तथा निगरानी की जायेगी |यानी 100 मीटर से नीचे का जो क्षेत्र है वहां पर मॉनिटरिंग के तहत खनन की सतत खनन की अनुमति दी गयी |
अरावली ग्रीन वाल परियोजना-
CEC की सिफारिश के बाद 2025 में अरावली ग्रीन वाल परियोजना शुरू की गयी |इस परियोजना का उद्देश्य अरावली का विस्तार |अरावली का विस्तार दिल्ली से गुजरात, हरियाणा तथा राजस्थान का भाग भी आता है |गुजरात, राजस्थान, हरियाणा तथा दिल्ली के जो 29 जिले है वहां पर अरावली क्षेत्र जहाँ पर है उसके चारों ओर एक 5 किलोमीटर का जो बफर जोन होगा वहां हरित आवरण का निर्माण करना है अर्थात ग्रीन कवर को बढ़ाना है |इस परियोजना का लक्ष्य 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर जो क्षतिग्रस्त भूमि है उस क्षतिग्रस्त भूमि का फिर से पुनरुद्धार करना है |
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