मुद्रास्फीति क्या है:कारण, प्रकार, प्रभाव और नियंत्रण के उपाय

हॉल ही में RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बिज़नेस लाइन इंटरव्यू में कहा रुपया Overvalued नहीं, बल्कि REER दोनों नजरिये से Undervalued है |इसी लेख में मुद्रास्फीति क्या है, प्रकार, कारण तथा प्रभाव पर चर्चा करेंगे |

मुद्रास्फीति क्या है:कारण, प्रकार, प्रभाव और नियंत्रण के उपाय

मुद्रास्फीति क्या है-

कीमत स्तर में सतत वृद्धि मुद्रास्फीति कहलाती है |मुद्रास्फीति वह स्थिति है जिसमें वस्तुओं के मूल्य बढ़ते है तथा मुद्रा का मूल्य गिरता है |वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य में निरंतर वृद्धि की स्थिति को मुद्रास्फीति कहते है तथा जिस दर वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य में वृद्धि होती है, उसे मुद्रास्फीति की दर कहते है |

एक निश्चित सीमा तक मुद्रास्फीति किसी अर्थव्यवस्था में आवश्यक भी होता है |यह निश्चित सीमा किसी देश की अपनी स्थिति पर निर्भर करती है |विकासशील देशों में विकसित देशों की अपेक्षा मुद्रास्फीति की दर उच्च होती है क्योंकि विकासशील देशों में पिछड़ेपन की स्थिति है और यहाँ व्यापक निवेश की आवश्यकता है |जब तक निवेशक को उच्च लाभ नहीं मिलेगा तब तक वह निवेश करने को उत्साहित नहीं होगा |

अगर किसी एक चीज के दाम बढ़े है तो ये महंगाई नहीं है |मुद्रास्फीति तब है जब अधिकतर चीजों के दाम बढ़ गए हो |

मुद्रास्फीति के कारण-

मुद्रास्फीति के निम्नलिखित कारण है-

A-मांगजनित मुद्रास्फीति-

जब किसी वस्तु की मांग बढ़ेगी तब उसका मूल्य भी बढ़ेगा |किसी वस्तु की मांग में वृद्धि के निम्न कारण है-

1-यदि जनसंख्या में वृद्धि हो जाये |

2-यदि सरकार लोक व्यय में वृद्धि कर दे |

3-बैंक बचत दर पर ब्याज कम कर दे |

4-RBI द्वारा मुद्रा का ज्यादा छापा जाना |

5-बैंकों द्वारा साख का ज्यादा सृजन करना |

6-सरकार प्रत्यक्ष करों में कमी कर दे |

7-रुपया बहुत ज्यादा है लेकिन खरीदने के लिए चीजें कम ये मांगजनित मुद्रास्फीति का मुख्य स्रोत है |

B-आपूर्तिजनित मुद्रास्फीति-

आपूर्ति कम होने के निम्न कारण हो सकते है-

1-मौसम की असफलता-सूखा, बाढ़ आदि |

2-कम्पनियों में हड़ताल तथा तालाबंदी |

3-कच्चे माल तथा बिजली की आपूर्ति में कमी |

4-जमाखोरी |

C-लागत जनित मुद्रास्फीति-

लागतों के बढ़ने से यदि वस्तु की कीमत में वृद्धि होती है, तो इसे लागत जनित मुद्रास्फीति कहते है |लागत जनित के निम्न कारण है-

1-कच्चा माल तथा मध्यवर्ती वस्तु की कीमत बढ़ गयी |

2-मजदूरी बढ़ गयी हो |

3-अप्रत्यक्ष करों में वृद्धि हो गयी हो |

4-खनिज तेलों के बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ रहा हो |
मुद्रास्फीति क्या है:कारण, प्रकार, प्रभाव और नियंत्रण के उपाय

मुद्रास्फीति के प्रकार-

1-अदृश्य या छुपी हुई मुद्रास्फीति-

जब कोई वस्तु अपरिवर्तित कीमत पर किंतु कम मात्रा के साथ बेचीं जाती है तो इसे अदृश्य या छिपी हुई मुद्रास्फीति कहते है |

2-शू-लेदर लागत स्फीति/जूता घिसाई मुद्रास्फीति-

उच्च मुद्रास्फीति के कारण उच्च जीवन स्तर कायम रखने हेतु बार-बार बैंक जमा निकासी के प्रयास में होने वाले अतिरिक्त व्यय को शू-लेदर लागत स्फीति कहते है |इसे Robert J. Shiller ने दिया था |

3-ब्रांडेड मुद्रास्फीति-

उदारीकरण के दौर में ब्रांडेड वस्तुओं के समक्ष भारतीय उत्पादों को कम कीमत के कारण घटिया न समझ लिया जाएँ इसलिए कीमतें बढ़ा कर बेचने के कारण होने वाली स्फीति को ब्रांडेड मुद्रास्फीति कहते है |

4-कृषिजन्य मुद्रास्फीति-

बागवानी फसलों को बढ़ावा, मक्का तथा गन्ने की खेती, जटफुरुवा की खेती एथेनाल के लिये |इस कारण खाद्यानों के क्षेत्रफल में कमी जिसके कारण खाद्यानों में कमी |परिणामस्वरूप खाद्यानों के मूल्य में वृद्धि होगी |

5-करेंसी मुद्रास्फीति-

यदि वस्तु की मात्रा में वृद्धि न हो लेकिन करेंसी में वृद्धि हो जाएँ तो कीमतें बढ़ने लगती है |

6-खुली तथा दबी मुद्रास्फीति-

नियंत्रणविहीन स्फीति को खुली हुई मुद्रास्फीति तथा नियंत्रण के बावजूद स्फीति को दबी हुई मुद्रास्फीति कहते है |

7-व्यापक स्फीति तथा छिट-पुट स्फीति-

अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों का एक साथ बढ़ना व्यापक मुद्रास्फीति कहलाता है जबकि कुछ ख़ास वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतें बढ़ना छिट-पुट मुद्रास्फीति कहलाती है |

दर-आधारित मुद्रास्फीति का वर्गीकरण-

1-रेंगती या नम्र मुद्रास्फीति-

जब मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 1 अंक में हो तो इसे नम्र या रेंगती हुई मुद्रास्फीति कहते है |इस प्रकार की मुद्रास्फीति लम्बी तथा एकक बनी रहती है |नम्र स्फीति को वांछनीय मन जाता है क्योंकि आर्थिक विकास में सहायक होती है |

2-सरपट या Galloping मुद्रास्फीति-

यह अत्यधिक उच्च मुद्रास्फीति होती है |शुरूआती दौर में Gallopic तथा अंतिम दौर में Hyper माना जाता है |यदि मुद्रास्फीति की वार्षिक दर 2 या 3 हो तो इसे सरपट मुद्रास्फीति कहते है |

3-हाइपर मुद्रास्फीति-

जब मुद्रास्फीति की दर 3 अंकों से भी अधिक हो जाएँ तो उसे हाइपर मुद्रास्फीति कहते है |इसकी सबसे पहली चर्चा केगन ने की थी |इस अवस्था में पत्र मुद्रा बिल्कुल बेकार हो जाती है |मुद्रा से लोगों का विश्वास उठ जाता है |

इस तरह की मुद्रास्फीति से घरेलू मुद्रा बहुत तेजी से अपना भरोसा खो देती है तथा लोग रूपये के दूसरे विकल्पों को अपनाना शुरू कर देते है |उदाहरण के लिए भौतिक वस्तुएं, जैसे सोना-विदेशी मुद्रा का लोग लेन-देन के विनिमय को भी अपना लेते है |

मुद्रास्फीति के प्रभाव-

अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति के बहुपक्षीय प्रभाव होते है |माइक्रो तथा मैक्रो दोनों ही स्तरों पर |ये आय का पुनर्वितरण करती है, सापेक्ष मूल्य को विखत कर देती है, रोजगार कर, बचत तथा निवेश नीतिओं को अस्थिर कर देती है और अंत में अर्तव्यवस्था में मंदी ला सकती है |हम निम्नलिखित आधार पर मुद्रास्फीति के प्रभावों का एक संक्षिप्त विवरण देख सकते है-

1-ऋणदाता तथा देनदार पर-

मुद्रास्फीति संपत्ति ऋणदाता से देनदार को पुनर्वितरण कर देती है, जैसे-उधार देने वाले को नुकसान होता है लेकिन मुद्रास्फीति से उधार लेने वाले को फायदा होता है |

2-उधारी पर-

मुद्रास्फीति बढ़ने पर उधार देने वाले संस्थानों पर ज्यादा उधार देने का दबाव पड़ता है |संस्थान ब्याज की मामूली दरों में संशोधन नहीं करते क्योंकि उधार की असली लागत उसी अनुपात में गिर जाती है जिस अनुपात में मुद्रास्फीति बढ़ती है |

3-कुल मांग पर-

बढ़ती मुद्रास्फीति कुल मांग के बढ़ने का संकेत देती है साथ ही अपेक्षाकृत कम आपूर्ति तथा उपभोक्ताओं के बीच उच्च क्रयशक्ति का संकेत भी देती है |आमतौर पर उच्च मुद्रास्फीति से उत्पादक को ये सुझाव मिलता है कि वो अपना उत्पादन बढ़ाये क्योंकि इस स्थिति को अर्थव्यवस्था में उच्च मांग के संकेत के तौर पर देखा जाता है |

4-निवेश पर-

मुद्रास्फीति के कारण से (अल्पावधि में) अर्थव्यवस्था में निवेश दो कारणों से बढ़ता है-

A-उच्च मुद्रास्फीति उच्च मांग का संकेत करती है तथा कारोबारियों को सुझाव देती है कि वो अपने उत्पादन का विस्तार करें |

B-मुद्रास्फीति जितनी ज्यादा होगी, कर्ज की लागत उतनी कम होगी |

5-आय पर-

मुद्रास्फीति का व्यक्तियों तथा संस्थाओं को आय पर एक जैसा प्रभाव पड़ता है |मुद्रास्फीति में बढ़ोत्तरी से आय की 'नॉमिनल' वैल्यू में थोड़ा इजाफा होता है जबकि आय की 'वास्तविक' वैल्यू उतनी ही रहती है |कीमत के स्तर बढ़ने से अल्पावधि में रुपये की क्रय शक्ति कम हो जाती है लेकिन दीर्घकाल में आय का स्तर भी बढ़ जाता है |

6-बचत पर-

अपने पास पैसा रोक कर रखना एक बुद्धिमत्तापूर्ण आर्थिक फैसला नहीं रह गया है |मुद्रास्फीति में हर बढ़ोत्तरी के साथ रुपया अपनी कीमत खोता जाता है |इसलिए लोग ज्यादा जल्दी-जल्दी बैंक जाते है तथा अपने पास कम-से कम रुपया रख कर अधिक से अधिक रुपया बैंक के बचत खातों में रखने की कोशिश करते है |इसका मतलब है कि बचत दर में वृद्धि होती है |लेकिन ऐसा मुद्रास्फीति के अल्पकालिक प्रभाव के तौर पर होता है |लम्बी अवधि में उच्च मुद्रास्फीति  अर्थव्यवस्था में बचत दर को कमजोर कर देती है |

7-खर्च पर-

मुद्रास्फीति खर्च के दोनों ही प्रकारों-उपभोग तथा निवेश को [प्रभावित करती है |दाम बढ़ने से हमारे उपभोग का स्तर नीचे आता है क्योंकि वस्तुओं तथा सेवाओं के लिए हमे ज्यादा कीमत चुकानी होती है |बढ़ते दाम के प्रभाव को रोकने के लिए हम लोगों में ये प्रवृत्ति देखते है कि वो अपना उपभोग के स्तर में कटौती कर लेते है, जिससे उपभोग पर होने वाला खर्च कम हो जाता है |इसी तरह जब कीमतें नीचे गिरती है तो इसके ठीक विपरीत परिस्थितियां बनती है |दूसरी तरफ मुद्रास्फीति निवेश के खर्च को बढ़ा देती है क्योंकि रुपये/वित्त की लागत कम हो जाती है |

8-कर पर-

अपने प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर देते समय कर दाताओं को परेशान होना पड़ता है |प्रत्यक्ष कर क्योंकि कुल कीमत पर लगाये जाते है ऐसे में वस्तुओं की बढ़ी कीमतों की वजह से करदाता को ज्यादा अप्रत्यक्ष कर देना पड़ता है |

जहाँ तक सरकार के कर संचय की बात है, मुद्रास्फीति से सकल कर राजस्व के मूल्य में मामूली बढ़ोत्तरी होती है |अगर सरकार उच्च राजकोषीय घाटे की स्थिति में है तो मुद्रास्फीति एक कर के रूप में काम करती है,जैसे-मुद्रास्फीति कर, जिसके जरिए सरकार लोगों के व्यय तथा उपभोग में कटौती कर अपने खर्च को पूरा करती है |

9-विनिमय दर पर-

हर मुद्रास्फीति के साथ अर्थव्यवस्था में मुद्रा का अवमूल्यन होता है जबकि अर्थव्यवस्था लचीली मुद्रा व्यवस्था को अपनाती हो |

10-निर्यात पर-

मुद्रास्फीति के साथ किसी अर्थव्यवस्था के निर्यात योग्य उत्पादों को दुनिया के बाजारों के साथ प्रतिस्पर्धात्मक मूल्य का फायदा मिलता है |इसकी वजह से निर्यात का आकार बढ़ता है |इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था के निर्यात वाले भाग को मुद्रास्फीति से फायदा मिलता है |

11-आयात पर-

मुद्रास्फीति की वजह से किसी अर्थव्यवस्था को कम आयात तथा आयात प्रतिस्थापन का फायदा मिलता है क्योंकिविदेशी चीजें महंगी हो जाती है, लेकिन अनिवार्य आयात के मामलें में अर्थव्यवस्था को ये लाभ नहीं मिलता तथा उसे विदेशी मुद्रा बचाने के बजाये ज्यादा खर्च करनी पड़ती है |

12-व्यापार संतुलन पर-

विकसित अर्थव्यवस्था के मामलें में मुद्रास्फीति व्यापार संतुलन को अनुकूल बनाती है जबकि विकासशील देशों में मुद्रास्फीति उनके व्यापार संतुलन के लिए अनुकूल नहीं है |ऐसा उनके विदेशी व्यापार के संयोजन की वजह से होता है |

13-रोजगार पर-

मुद्रास्फीति की वजह से अल्पावधि में रोजगार में इजाफा होता है लेकिन दीर्घकाल में या तो ये बेअसर रहता है या फिर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है |

14-मजदूरी पर-

मुद्रास्फीति के कारण मजदूरी की नॉमिनल वैल्यू बढ़ जाती है जबकि इसकी रियल वैल्यू गिर जाती है |

15-स्वरोजगार पर-

अल्पावधि में स्वरोजगार करने वालों पर मुद्रास्फीति का कोई असर नहीं पड़ता है |लेकिन लंबे समय में उन पर भी इसका असर पड़ता है क्योंकि पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है |

मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के उपाय-

A-मौद्रिक उपाय-

मौद्रिक उपायों का प्रयोग देश के केंद्रीय बैंक द्वारा किया जाता है |मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए कई कदम उठाये जा सकते है-

1-साख नियंत्रण |

2-नकदी का विमुद्रीकरण |

3-नयी मुद्रा का निर्गमन |

B-राजकोषीय/ वित्तीय उपाय-

राजकोषीय उपाय वित्त मंत्रालय द्वारा बजट सम्बन्धी विभिन्न उपकरणों के माध्यम से उपाय किये जाते है-

1-अनावश्यक व्ययों में कटौती |

2-करों में परिवर्तन |

3-बचतों में प्रोत्साहन |

4-सार्वजनिक ऋण |

C-अन्य उपाय-

इसके अंतर्गत प्रशासनिक उपाय शामिल किये जाते है जो प्रत्यक्ष रूप से समग्र आपूर्ति में वृद्धि तथा समग्र मांग में कमी लाते है-

1-उत्पादन में वृद्धि |

2-सार्वजनिक वितरण प्रणाली |

3-कीमत नियंत्रण उपाय |

4-जमाखोरी निरोधक उपाय |

5-प्रतिस्पर्धा में वृद्धि |

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